नक्सलवाद खत्म होने का दावा या सुरक्षा के नाम पर सरकारी खजाने की लूट? भाजपा सरकार जवाब दे!अमन वर्मा ने अमित शाह और विजय शर्मा पर साधा निशाना, कहा—नक्सलवाद खत्म हो गया तो नेताओं की सुरक्षा पर हर साल 150 करोड़ रुपये खर्च करने की क्या मजबूरी है?

कवर्धा। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद कमजोर होने और प्रदेश को नक्सलमुक्त बनाने के भाजपा सरकार के दावों के बीच राजनेताओं की सुरक्षा पर होने वाला भारी-भरकम खर्च सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। छात्र नेता अमन वर्मा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा और भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि एक तरफ नक्सलवाद खत्म होने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ नेताओं की सुरक्षा के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। आखिर भाजपा सरकार प्रदेश की जनता को सच क्या बता रही है?
अमन वर्मा ने उपलब्ध आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि बस्तर में सरपंच, पंचायत सचिव, मंडल अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष जैसे विभिन्न पदों पर रहे 250 से अधिक नेताओं की सुरक्षा में 1,000 से ज्यादा जवान तैनात होने और इस पर सालाना करीब 100 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आ रही है। वहीं, पूरे छत्तीसगढ़ में लगभग 400 नेताओं की सुरक्षा में 1,550 से अधिक पुलिसकर्मी और 500 से ज्यादा वाहन लगाए जाने तथा सालाना करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होने के आंकड़े चिंताजनक हैं।
अमन वर्मा ने सवाल उठाया कि जब उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा छत्तीसगढ़ को नक्सलमुक्त बनाने का दावा करते हैं, तो फिर नेताओं की सुरक्षा पर इतना भारी खर्च क्यों हो रहा है? क्या भाजपा सरकार के नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़ के दावे और जमीनी हकीकत में इतना बड़ा अंतर है कि सरकार को अपने ही दावों के बावजूद नेताओं की सुरक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं?
उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह देशभर में नक्सलवाद समाप्त करने की समय-सीमा और उपलब्धियों की बात करते हैं, वहीं छत्तीसगढ़ में सुरक्षा व्यवस्था पर हो रहा यह भारी खर्च सरकार से पारदर्शिता की मांग करता है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि किन नेताओं को किस खतरे के आधार पर सुरक्षा दी गई है, सुरक्षा की समीक्षा कब हुई और इस खर्च का वास्तविक औचित्य क्या है।
अमन वर्मा ने कहा कि भाजपा सरकार को प्रचार और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर मिटाना होगा। यदि नक्सलवाद पर निर्णायक सफलता मिली है, तो सरकार को सुरक्षा व्यवस्था की निष्पक्ष समीक्षा करनी चाहिए। यदि खतरा अभी भी गंभीर है, तो नक्सलवाद समाप्त होने के बड़े-बड़े दावों की वास्तविक स्थिति भी जनता के सामने रखनी चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि छत्तीसगढ़ में बेरोजगार युवा रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, छात्र बेहतर शिक्षा और सुविधाओं की मांग कर रहे हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की कमी बनी हुई है। ऐसे समय में सरकारी खर्च के प्रत्येक रुपये का हिसाब जनता को मिलना चाहिए। पुलिस बल की तैनाती जनसुरक्षा और कानून-व्यवस्था की जरूरतों के आधार पर होनी चाहिए, न कि राजनीतिक रसूख के आधार पर।
अमन वर्मा ने भाजपा सरकार से सीधे सवाल पूछे:
1. यदि छत्तीसगढ़ नक्सलमुक्त हो चुका है, तो नेताओं की सुरक्षा पर हर साल करीब 150 करोड़ रुपये खर्च करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
2. किन मानकों के आधार पर नेताओं को सुरक्षा प्रदान की जा रही है और इसकी समीक्षा कितनी पारदर्शिता से होती है?
3. क्या सरकार सुरक्षा व्यवस्था और उस पर होने वाले खर्च का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक करेगी?
4. क्या भाजपा सरकार जनता को यह भरोसा दिलाएगी कि सुरक्षा के नाम पर पुलिस बल का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिष्ठा के बजाय वास्तविक खतरे के आकलन के आधार पर किया जा रहा है?
अंत में अमन वर्मा ने कहा कि भाजपा सरकार को केवल नक्सलवाद खत्म होने के दावे करके अपनी पीठ थपथपाने के बजाय जनता के सामने खर्च और सुरक्षा व्यवस्था का पूरा हिसाब रखना चाहिए। अमित शाह और विजय शर्मा को बताना चाहिए कि छत्तीसगढ़ वास्तव में कितना सुरक्षित हुआ है और जनता की गाढ़ी कमाई का इतना बड़ा हिस्सा नेताओं की सुरक्षा पर खर्च करने की जरूरत क्यों बनी हुई है।
जनता को दावों की नहीं, जवाबदेही की जरूरत है। सरकारी खजाना किसी पार्टी की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की मेहनत की कमाई है।



